शिवसेना पार्टी पर असली दावेदारी को लेकर इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई जारी है. जिसमें पार्टी के चुनाव चिंत धनुष-बाण पर दोनों पक्ष अपना-अपना दावा जता रहे हैं. मंगलवार को शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव किया जिसमें शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव-चिंग धनुष-बाण आवंटित किया गया था.
क्या है पूरा मामला ?
दरअसल यह पूरा मामला 2022 में शुरू हुआ, जब शिवसेना में टूट के बाद पार्टी दो गुटों में बंट गयी. शिवसेना उद्धव गुट ने चुनाव आयोग के 17 फरवरी 2023 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इसमें शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव-चिंग आवंटित किया गया था.
ठाकरे गुट का तर्क है कि विधायकों के एक समूह के अलग होने को राजनीतिक पार्टी में विभाजन नहीं माना जा सकता. जबकि शिंदे गुट का दावा है कि 2022 का विवाद सिर्फ विधायी दल तक सीमित नहीं था. बल्कि पार्टी कराकर्ताओं में भी असंतोष था.
शिंदे गुट की दलील
शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग को पार्टी के संगठनात्मक ढाँचे और उसकी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की जांच करने का अधिकार है. उनके मुताबिक विधायकों की संख्या बल्कि पार्टी की कैडर की स्थिति भी देखनी चाहिए.
दो मामले सुप्रीम कोर्ट में
सुप्रीम कोर्ट इस समय शिवसेना से जुड़े दो मामलों को सुन रहा है, पहला महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती है, जिसमें बागी शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित नहीं किया गया. दूसरा मामला आयोग के फैसले के खिलाफ है, जिसमें चुनाव-चिन्ह धनुष-बाण दिया गया. अभी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई अंतिम फैसला नहीं आया है. लेकिन इस सुनवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.